Shree Ranakpur Tirth

श्री राणकपुर तीर्थ

 
Jain_Temple_Ranakpur

मंदिर का दृश्य |


ranakpur

मुलनायक भगवान

श्री आदेश्वर भगवान, श्वेत वर्ण, पद्मासनस्थ ,लगभग १८० सें. मी. (श्वे. मंदिर) |


तीर्थ स्थल –

                                 अरावली गिरिमाला की छोटी-छोटी पहाडियो व शांत ,एकांत तथा निर्जन प्रकृति के त्रिविध सौंदर्य के बीच कलकल बहती हुई नन्ही-सी मगाई नदी के किनारे |


प्राचीनता –

                                 इस तीर्थ का इतिहास वि. सं. १४४६ से प्रारम्भ होता है |वि.सं. १४९९ में स्वयम यात्रा करते हुए आँखों देखकर पं. मेघ कवी ने अपने द्वारा रचित “रानिगपुर चतुमुर्ख प्रासाद स्तवन में इस राणकपुर नगरी को पाटन के समान बताया गया है |उस समय सुसंपन्न श्रावको के ३००० घर विद्धामान थे |अट्टारहवी सदी में श्री गिआनविंल्सुरिश्वर्जी व श्री समयसुन्दर उपाधयाजी ने अपने स्तावनो में इस तीर्थ का अतयन्त सुन्दर वर्णन किया है |

                                समस्त जैन संघ द्वारा स्थापित सेठ श्री आनंदजी कलयानजी पेढ़ी ने इन मंदिरों का जिनोर्द्वारा करवाकर पुन: प्रतिष्ठा वि. सं. २००९ में करवाई थी |


परिचय –

                                इस तीर्थ की विशेषता का इतिहास भी अति गौरवशाली है |इस तीर्थ के निर्माण का मुख्य श्रेय आचार्य श्री सोम्सुन्दार्सुरिश्वर्जी ने कीया |इनकी ही प्रेरणा से राणकपुर के समीपस्थ हुआ है | धर्मनिष्ठ राणा कुंभा द्वारा मंदिर के निर्माणकारय में दिया गया योगदान भी उल्लेखनिय है |जब धरणाशाह ने राणा के समुख मंदिर बनाने की भावना प्रकट की व उस के लिए ,तब राणा प्रफूलित हुए व मंदिर के लिए जमींन देने के अतिरिक्त उन्होंने मंदिर के निकट नगर बसाने की भी सलाह दी |

                               जिन्होंने इस मंदिर की शिल्पकारी की है हम उन्हे भी नहीं भुल सकते |राणकपुर ,प्राकृतिक सौंदर्य के साथ कला व भक्ति का संगम स्थान है |इस ढंग का विशिट संगम-स्थान कम जगह देखने मिलेगा |अत: यह कैसे सुन्दर एवं अपूर्व योग बनकर मानव के चित को आलहृयादित करता हुआ, प्रभुभक्ति की ओर उससे खीच लेता है ,इसका उदाहरण यह तीर्थस्थल है |

                               मंदिर में सबसे अनोखी विशेषता उसकी विभिन्न स्तंभावली है |कूल १४४४ स्तंभ बताए जाते है ,लेकिन गिनना कटिन है |मंदिरों में कई नेक तलघर बनाए हुए है |इन तलघरो में बहुत सी जिनप्रतिमाएं है | इस मंदिर के अतिरिक्त श्री नेमिनाथ भगवान व श्री पार्श्वनाथ भगवान के मंदिर का शिल्पकला अपना अलग ही स्थान रखती है |